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Quran Hindi Translation

Surah Al Hijr

Translation by Mufti Mohammad Mohiuddin Khan



بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

In the name of Allah, Most Gracious,Most Merciful


1

الر ۚ تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ وَقُرْآنٍ مُبِينٍ

अलिफ़ लाम रा

ये किताब (ख़ुदा) और वाजेए व रौशन क़ुरान की (चन्द) आयते हैं

2

رُبَمَا يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ كَانُوا مُسْلِمِينَ

(एक दिन वह भी आने वाला है कि)

जो लोग काफ़िर हो बैठे हैं अक्सर दिल से चाहेंगें काश (हम भी) मुसलमान होते

3

ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الْأَمَلُ ۖفَسَوْفَ يَعْلَمُونَ

(ऐ रसूल) उन्हें उनकी हालत पर रहने दो कि खा पी लें और (दुनिया के चन्द रोज़) चैन कर लें और उनकी तमन्नाएँ उन्हें खेल तमाशे में लगाए रहीं

अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा

4

وَمَا أَهْلَكْنَا مِنْ قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَعْلُومٌ

और हमने कभी कोई बस्ती तबाह नहीं की मगर ये कि उसकी तबाही के लिए (पहले ही से) समझी बूझी मियाद मुक़र्रर लिखी हुई थी

5

مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ

कोई उम्मत अपने वक्त से न आगे बढ़ सकती है न पीछे हट सकती है

6

وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ

(ऐ रसूल कुफ्फ़ारे मक्का तुमसे)

कहते हैं कि ऐ शख़्श (जिसको ये भरम है) कि उस पर 'वही' व किताब नाज़िल हुई है तो (अच्छा ख़ासा) सिड़ी है

7

لَوْ مَا تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ

अगर तू अपने दावे में सच्चा है तो फरिश्तों को हमारे सामने क्यों नहीं ला खड़ा करता

8

مَا نُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ إِلَّا بِالْحَقِّ وَمَا كَانُوا إِذًا مُنْظَرِينَ

(हालॉकि) हम फरिश्तों को खुल्लम खुल्ला (जिस अज़ाब के साथ) फैसले ही के लिए भेजा करते हैं और (अगर फरिश्ते नाज़िल हो जाए तो) फिर उनको (जान बचाने की) मोहलत भी न मिले

9

إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ

बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं

10

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ فِي شِيَعِ الْأَوَّلِينَ

(ऐ रसूल) हमने तो तुमसे पहले भी अगली उम्मतों में (और भी बहुत से) रसूल भेजे

11

وَمَا يَأْتِيهِمْ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ

और (उनकी भी यही हालत थी कि) उनके पास कोई रसूल न आया मगर उन लोगों ने उसकी हँसी ज़रुर उड़ाई

12

كَذَلِكَ نَسْلُكُهُ فِي قُلُوبِ الْمُجْرِمِينَ

हम (गोया खुद) इसी तरह इस (गुमराही) को (उन) गुनाहगारों के दिल में डाल देते हैं

13

لَا يُؤْمِنُونَ بِهِ ۖ وَقَدْ خَلَتْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ

ये कुफ्फ़ार इस (क़ुरान) पर ईमान न लाएँगें

और (ये कुछ अनोखी बात नहीं) अगलों के तरीक़े भी (ऐसे ही) रहें है

14

وَلَوْ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَابًا مِنَ السَّمَاءِ فَظَلُّوا فِيهِ يَعْرُجُونَ

और अगर हम अपनी कुदरत से आसमान का एक दरवाज़ा भी खोल दें और ये लोग दिन दहाड़े उस दरवाज़े से (आसमान पर) चढ़ भी जाएँ

15

لَقَالُوا إِنَّمَا سُكِّرَتْ أَبْصَارُنَا بَلْ نَحْنُ قَوْمٌ مَسْحُورُونَ

तब भी यहीं कहेगें कि हो न हो हमारी ऑंखें (नज़र बन्दी से) मतवाली कर दी गई हैं या नहीं तो हम लोगों पर जादू किया गया है

16

وَلَقَدْ جَعَلْنَا فِي السَّمَاءِ بُرُوجًا وَزَيَّنَّاهَا لِلنَّاظِرِينَ

और हम ही ने आसमान में बुर्ज बनाए और देखने वालों के वास्ते उनके (सितारों से) आरास्ता (सजाया) किया

17

وَحَفِظْنَاهَا مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ رَجِيمٍ

और हर शैतान मरदूद की आमद रफत (आने जाने) से उन्हें महफूज़ रखा

18

إِلَّا مَنِ اسْتَرَقَ السَّمْعَ فَأَتْبَعَهُ شِهَابٌ مُبِينٌ

मगर जो शैतान चोरी छिपे (वहाँ की किसी बात पर) कान लगाए तो यहाब का दहकता हुआ योला उसके (खदेड़ने को) पीछे पड़ जाता है

19

وَالْأَرْضَ مَدَدْنَاهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ وَأَنْبَتْنَا فِيهَا مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَوْزُونٍ

और ज़मीन को (भी अपने मख़लूक़ात के रहने सहने को) हम ही ने फैलाया और इसमें (कील की तरह) पहाड़ो के लंगर डाल दिए

और हमने उसमें हर किस्म की मुनासिब चीज़े उगाई

20

وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَايِشَ وَمَنْ لَسْتُمْ لَهُ بِرَازِقِينَ

और हम ही ने उन्हें तुम्हारे वास्ते ज़िन्दगी के साज़ों सामान बना दिए और उन जानवरों के लिए भी जिन्हें तुम रोज़ी नहीं देते

21

‏وَإِنْ مِنْ شَيْءٍ إِلَّا عِنْدَنَا خَزَائِنُهُ وَمَا نُنَزِّلُهُ إِلَّا بِقَدَرٍ مَعْلُومٍ

और हमारे यहाँ तो हर चीज़ के बेशुमार खज़ाने (भरे) पड़े हैं

और हम (उसमें से) एक जची तली मिक़दार भेजते रहते है

22

وَأَرْسَلْنَا الرِّيَاحَ لَوَاقِحَ  فَأَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَسْقَيْنَاكُمُوهُ وَمَا أَنْتُمْ لَهُ بِخَازِنِينَ

और हम ही ने वह हवाएँ भेजी जो बादलों को पानी से (भरे हुए) है

फिर हम ही ने आसमान से पानी बरसाया फिर हम ही ने तुम लोगों को वह पानी पिलाया

और तुम लोगों ने तो कुछ उसको जमा करके नहीं रखा था

23

وَإِنَّا لَنَحْنُ نُحْيِي وَنُمِيتُ  وَنَحْنُ الْوَارِثُونَ

और इसमें शक़ नहीं कि हम ही (लोगों को) जिलाते और हम ही मार डालते हैं

और (फिर) हम ही (सब के) वाली वारिस हैं

24

وَلَقَدْ عَلِمْنَا الْمُسْتَقْدِمِينَ مِنْكُمْ وَلَقَدْ عَلِمْنَا الْمُسْتَأْخِرِينَ

और बेशक हम ही ने तुममें से उन लोगों को भी अच्छी तरह समझ लिया जो पहले हो गुज़रे

और हमने उनको भी जान लिया जो बाद को आने वाले हैं

25

وَإِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَحْشُرُهُمْ ۚ إِنَّهُ حَكِيمٌ عَلِيمٌ

और इसमें शक़ नहीं कि तेरा परवरदिगार वही है जो उन सब को (क़यामत में कब्रों से) उठाएगा

बेशक वह हिक़मत वाला वाक़िफकार है

26

وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ

और बेशक हम ही ने आदमी को ख़मीर (गुंधी) दी हुईसड़ी मिट्टी से जो (सूखकर) खन खन बोलने लगे पैदा किया

27

وَالْجَانَّ خَلَقْنَاهُ مِنْ قَبْلُ مِنْ نَارِ السَّمُومِ

और हम ही ने जिन्नात को आदमी से (भी) पहले वे धुएँ की तेज़ आग से पैदा किया

28

وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَائِكَةِ إِنِّي خَالِقٌ بَشَرًا مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ

और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब तुम्हारे परवरदिगार ने फरिश्तों से कहा कि

मैं एक आदमी को खमीर दी हुई मिट्टी से (जो सूखकर) खन खन बोलने लगे पैदा करने वाला हूँ

29

فَإِذَا سَوَّيْتُهُ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِنْ رُوحِي فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ

तो जिस वक्त मै उसको हर तरह से दुरुस्त कर चुके और उसमें अपनी (तरफ से) रुह फूँक दूँ तो सब के सब उसके सामने सजदे में गिर पड़ना

30

فَسَجَدَ الْمَلَائِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ

ग़रज़ फरिश्ते तो सब के सब सर ब सजूद हो गए

31

إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَى أَنْ يَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ

मगर इबलीस (मलऊन) की उसने सजदा करने वालों के साथ शामिल होने से इन्कार किया

32

قَالَ يَا إِبْلِيسُ مَا لَكَ أَلَّا تَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ

(इस पर ख़ुदा ने) फरमाया आओ शैतान आख़िर तुझे क्या हुआ कि तू सजदा करने वालों के साथ शामिल न हुआ

33

قَالَ لَمْ أَكُنْ لِأَسْجُدَ لِبَشَرٍ خَلَقْتَهُ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ

वह (ढिठाई से) कहने लगा मैं ऐसा गया गुज़रा तो हूँ नहीं कि ऐसे आदमी को सजदा कर बैठूँ जिसे तूने सड़ी हुई खन खन बोलने वाली मिट्टी से पैदा किया है

34

 قَالَ فَاخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌ

ख़ुदा ने फरमाया (नहीं तू) तो बेहश्त से निकल जा (दूर हो) कि बेशक तू मरदूद है

35

وَإِنَّ عَلَيْكَ اللَّعْنَةَ إِلَى يَوْمِ الدِّينِ

और यक़ीनन तुझ पर रोज़े में जज़ा तक फिटकार बरसा करेगी

36

قَالَ رَبِّ فَأَنْظِرْنِي إِلَى يَوْمِ يُبْعَثُونَ

शैतान ने कहा ऐ मेरे परवरदिगार ख़ैर तू मुझे उस दिन तक की मोहलत दे जबकि (लोग दोबारा ज़िन्दा करके) उठाए जाएँगें

37

قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ الْمُنْظَرِينَ

ख़ुदा ने फरमाया तुझे मोहलत दी गई

38

إِلَى يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُومِ

वक्त मुक़र्रर के दिन तक

39

قَالَ رَبِّ بِمَا أَغْوَيْتَنِي لَأُزَيِّنَنَّ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ

उन शैतान ने कहा ऐ मेरे परवरदिगार चूंकि तूने मुझे रास्ते से अलग किया मैं भी उनके लिए दुनिया में (साज़ व सामान को) उम्दा कर दिखाऊँगा और सबको ज़रुर बहकाऊगा

40

إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ

मगर उनमें से तेरे निरे खुरे ख़ास बन्दे (कि वह मेरे बहकाने में न आएँगें)

41

قَالَ هَذَا صِرَاطٌ عَلَيَّ مُسْتَقِيمٌ

ख़ुदा ने फरमाया कि यही राह सीधी है कि मुझ तक (पहुँचती) है

42

إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ إِلَّا مَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْغَاوِينَ

जो मेरे मुख़लिस (ख़ास बन्दे) बन्दे हैं उन पर तुझसे किसी तरह की हुकूमत न होगी मगर हाँ गुमराहों में से जो तेरी पैरवी करे (उस पर तेरा वार चल जाएगा)

43

‏وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمَوْعِدُهُمْ أَجْمَعِينَ

और हाँ ये भी याद रहे कि उन सब के वास्ते (आख़िरी) वायदा बस जहन्नम है

44

لَهَا سَبْعَةُ أَبْوَابٍ لِكُلِّ بَابٍ مِنْهُمْ جُزْءٌ مَقْسُومٌ

जिसके सात दरवाजे होगे

हर (दरवाज़े में जाने) के लिए उन गुमराहों की अलग अलग टोलियाँ होगीं

45

إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ

और परहेज़गार तो बेहश्त के बाग़ों और चश्मों मे यक़ीनन होंगे

46

ادْخُلُوهَا بِسَلَامٍ آمِنِينَ

(दाख़िले के वक्त फ़रिश्ते कहेगें कि) उनमें सलामती इत्मिनान से चले चलो

47

وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَى سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ

और (दुनिया की तकलीफों से) जो कुछ उनके दिल में रंज था उसको भी हम निकाल देगें

और ये बाहम एक दूसरे के आमने सामने तख्तों पर इस तरह बैठे होगें जैसे भाई भाई

48

لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌ وَمَا هُمْ مِنْهَا بِمُخْرَجِينَ

उनको बेहश्त में तकलीफ छुएगी भी तो नहीं और न कभी उसमें से निकाले जाएँगें

49

نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ

(ऐ रसूल) मेरे बन्दों को आगाह करो कि बेशक मै बड़ा बख्शने वाला मेहरबान हूँ

50

 وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ

मगर साथ ही इसके (ये भी याद रहे कि) बेशक मेरा अज़ाब भी बड़ा दर्दनाक अज़ाब है

51

وَنَبِّئْهُمْ عَنْ ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ

और उनको इबराहीम के मेहमान का हाल सुना दो

52

إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا قَالَ إِنَّا مِنْكُمْ وَجِلُونَ

कि जब ये इबराहीम के पास आए तो (पहले) उन्होंने सलाम किया

इबराहीम ने (जवाब सलाम के बाद) कहा हमको तो तुम से डर मालूम होता है

53

قَالُوا لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ

उन्होंने कहा आप मुत्तालिक़ ख़ौफ न कीजिए (क्योंकि) हम तो आप को एक (दाना व बीना) फरज़न्द (के पैदाइश) की खुशख़बरी देते हैं

54

قَالَ أَبَشَّرْتُمُونِي عَلَى أَنْ مَسَّنِيَ الْكِبَرُ فَبِمَ تُبَشِّرُونَ

इब्राहिम ने कहा क्या मुझे ख़ुशख़बरी (बेटा होने की) देते हो जब मुझे बुढ़ापा छा गया

तो फिर अब काहे की खुशख़बरी देते हो

55

قَالُوا بَشَّرْنَاكَ بِالْحَقِّ فَلَا تَكُنْ مِنَ الْقَانِطِينَ

वह फरिश्ते बोले हमने आप को बिल्कुल ठीक खुशख़बरी दी है

तो आप (बारगाह ख़ुदा बन्दी से) ना उम्मीद न हो

56

قَالَ وَمَنْ يَقْنَطُ مِنْ رَحْمَةِ رَبِّهِ إِلَّا الضَّالُّونَ

इबराहीम ने कहा गुमराहों के सिवा और ऐसा कौन है जो अपने परवरदिगार की रहमत से ना उम्मीद हो

57

قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ

(फिर) इबराहीम ने कहा ऐ (ख़ुदा के) भेजे हुए (फरिश्तों) तुम्हें आख़िर क्या मुहिम दर पेश है

58

قَالُوا إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَى قَوْمٍ مُجْرِمِينَ

उन्होंने कहा कि हम तो एक गुनाहगार क़ौम की तरफ (अज़ाब नाज़िल करने के लिए) भेजे गए हैं

59

إِلَّا آلَ لُوطٍ إِنَّا لَمُنَجُّوهُمْ أَجْمَعِينَ

मगर लूत के लड़के वाले कि हम उन सबको ज़रुर बचा लेगें

60

إِلَّا امْرَأَتَهُ قَدَّرْنَا ۙ إِنَّهَا لَمِنَ الْغَابِرِينَ

मगर उनकी बीबी जिसे हमने ताक लिया है कि वह ज़रुर (अपने लड़के बालों के) पीछे (अज़ाब में) रह जाएगी

61

فَلَمَّا جَاءَ آلَ لُوطٍ الْمُرْسَلُونَ

ग़रज़ जब (ख़ुदा के) भेजे हुए (फरिश्ते) लूत के बाल बच्चों के पास आए

62

قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ مُنْكَرُونَ

तो लूत ने कहा कि तुम तो (कुछ) अजनबी लोग (मालूम होते हो)

63

قَالُوا بَلْ جِئْنَاكَ بِمَا كَانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ

फरिश्तों ने कहा (नहीं) बल्कि हम तो आपके पास वह (अज़ाब) लेकर आए हैं जिसके बारे में आपकी क़ौम के लोग शक़ रखते थे

64

 وَأَتَيْنَاكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ

(कि आए न आए) और हम आप के पास (अज़ाब का) कलई (सही) हुक्म लेकर आए हैं और हम बिल्कुल सच कहते हैं

65

فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَاتَّبِعْ أَدْبَارَهُمْ

बस तो आप कुछ रात रहे अपने लड़के बालों को लेकर निकल जाइए और आप सब के सब पीछे रहिएगा

 وَلَا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَامْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ

और उन लोगों में से कोई मुड़कर पीछे न देखे

और जिधर (जाने) का हुक्म दिया गया है (शाम) उधर (सीधे) चले जाओ

66

وَقَضَيْنَا إِلَيْهِ ذَلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَؤُلَاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ

और हमने लूत के पास इस अम्र का क़तई फैसला कहला भेजा कि बस सुबह होते होते उन लोगों की जड़ काट डाली जाएगी

67

وَجَاءَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ

और (ये बात हो रही थीं कि) शहर के लोग (मेहमानों की ख़बर सुन कर बुरी नीयत से) खुशियाँ मनाते हुए आ पहुँचे

68

قَالَ إِنَّ هَؤُلَاءِ ضَيْفِي فَلَا تَفْضَحُونِ

लूत ने (उनसे कहा) कि ये लोग मेरे मेहमान है तो तुम (इन्हें सताकर) मुझे रुसवा बदनाम न करो

69

وَاتَّقُوا اللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ

और ख़ुदा से डरो और मुझे ज़लील न करो

70

قَالُوا أَوَلَمْ نَنْهَكَ عَنِ الْعَالَمِينَ

वह लोग कहने लगे क्यों जी हमने तुम को सारे जहाँन के लोगों (के आने) की मनाही नहीं कर दी थी

71

قَالَ هَؤُلَاءِ بَنَاتِي إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ

लूत ने कहा अगर तुमको (ऐसा ही) करना है तो ये मेरी क़ौम की बेटियाँ मौजूद हैं (इनसे निकाह कर लो)

72

لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِي سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ

ऐ रसूल तुम्हारी जान की कसम ये लोग (क़ौम लूत) अपनी मस्ती में मदहोश हो रहे थे

(लूत की सुनते काहे को)

73

فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ

ग़रज़ सूरज निकलते निकलते उनको (बड़े ज़ोरो की) चिघाड़ न ले डाला

74

فَجَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِنْ سِجِّيلٍ

फिर हमने उसी बस्ती को उलट कर उसके ऊपर के तबके क़ो नीचे का तबक़ा बना दिया

और उसके ऊपर उन पर खरन्जे के पत्थर बरसा दिए

75

إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآيَاتٍ لِلْمُتَوَسِّمِينَ

इसमें शक़ नहीं कि इसमें (असली बात के) ताड़ जाने वालों के लिए (कुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं

76

وَإِنَّهَا لَبِسَبِيلٍ مُقِيمٍ

और वह उलटी हुई बस्ती हमेशा (की आमदरफ्त) के रास्ते पर है

77

إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآيَةً لِلْمُؤْمِنِينَ

इसमें तो शक हीं नहीं कि इसमें ईमानदारों के वास्ते (कुदरते ख़ुदा की) बहुत बड़ी निशानी है

78

وَإِنْ كَانَ أَصْحَابُ الْأَيْكَةِ لَظَالِمِينَ

और एैका के रहने वाले (क़ौमे शुएब की तरह) बड़े सरकश थे

79

فَانْتَقَمْنَا مِنْهُمْ وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ

तो उन से भी हमने (नाफरमानी का) बदला लिया और ये दो बस्तियाँ (क़ौमे लूत व शुएब की) एक खुली हुई यह राह पर (अभी तक मौजूद) हैं

80

وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَابُ الْحِجْرِ الْمُرْسَلِينَ

और इसी तरह हिज्र के रहने वालों (क़ौम सालेह ने भी) पैग़म्बरों को झुठलाया

81

وَآتَيْنَاهُمْ آيَاتِنَا فَكَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ

और (बावजूद कि) हमने उन्हें अपनी निशानियाँ दी उस पर भी वह लोग उनसे रद गिरदानी करते रहे

82

وَكَانُوا يَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا آمِنِينَ

और बहुत दिल जोई से पहाड़ों को तराश कर घर बनाते रहे

83

فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُصْبِحِينَ

आख़िर उनके सुबह होते होते एक बड़ी (जोरों की) चिंघाड़ ने ले डाला

84

فَمَا أَغْنَى عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ

फिर जो कुछ वह अपनी हिफाज़त की तदबीर किया करते थे (अज़ाब ख़ुदा से बचाने में) कि कुछ भी काम न आयीं

85

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ

और हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उन दोनों के दरमियान में है हिकमत व मसलहत से पैदा किया है

وَإِنَّ السَّاعَةَ لَآتِيَةٌ ۖ فَاصْفَحِ الصَّفْحَ الْجَمِيلَ

और क़यामत यक़ीनन ज़रुर आने वाली है

तो तुम (ऐ रसूल) उन काफिरों से शाइस्ता उनवान (अच्छे बरताव) के साथ दर गुज़र करो

86

إِنَّ رَبَّكَ هُوَ الْخَلَّاقُ الْعَلِيمُ

इसमें शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बड़ा पैदा करने वाला है  (और) बड़ा दाना व बीना है

87

وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي وَالْقُرْآنَ الْعَظِيمَ

और हमने तुमको सबए मसानी (सूरे हम्द) और क़ुरान अज़ीम अता किया है

88

‏لَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَى مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْهُمْ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ

और हमने जो उन कुफ्फारों में से कुछ लोगों को (दुनिया की) माल व दौलत से निहाल कर दिया है तुम उसकी तरफ हरगिज़ नज़र भी न उठाना

और न उनकी (बेदीनी) पर कुछ अफसोस करना

وَاخْفِضْ جَنَاحَكَ لِلْمُؤْمِنِينَ

और ईमानदारों से (अगरचे ग़रीब हो) झुककर मिला करो

89

وَقُلْ إِنِّي أَنَا النَّذِيرُ الْمُبِينُ

और कहा दो कि मै तो (अज़ाबे ख़ुदा से) सरीही तौर से डराने वाला हूँ

90

كَمَا أَنْزَلْنَا عَلَى الْمُقْتَسِمِينَ

(ऐ रसूल उन कुफ्फारों पर इस तरह अज़ाब नाज़िल करेगें)

जिस तरह हमने उन लोगों पर नाज़िल किया जिन्होंने विभाजित कर दिया

91

الَّذِينَ جَعَلُوا الْقُرْآنَ عِضِينَ

यानी क़ुरान को बॉट कर टुकडे टुकड़े कर डाला (बाज़ को माना बाज को नहीं)

92

فَوَرَبِّكَ لَنَسْأَلَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ

तो ऐ रसूल तुम्हारे ही परवरदिगार की (अपनी) क़सम कि हम उनसे ज़रुर (बहुत सख्ती से) बाज़ पुर्स (पुछताछ) करेंगे

93

عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ

जो कुछ ये (दुनिया में) किया करते थे

94

فَاصْدَعْ بِمَا تُؤْمَرُ وَأَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِينَ

इसलिये जो आदेश तुम्हें मिला है वह (लोगों को) सुना दो और मुशरेकीन की तरफ से मुँह फेर लो

95

إِنَّا كَفَيْنَاكَ الْمُسْتَهْزِئِينَ

जो लोग तुम्हारी हँसी उड़ाते है हम तुम्हारी तरफ से उनके लिए काफी हैं

96

الَّذِينَ يَجْعَلُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ

और ख़ुदा के साथ दूसरे परवरदिगार को (शरीक) ठहराते हैं

तो अनक़रीब ही उन्हें मालूम हो जाएगा  

97

وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّكَ يَضِيقُ صَدْرُكَ بِمَا يَقُولُونَ

कि तुम जो इन (कुफ्फारों मुनाफिक़ीन) की बातों से दिल तंग होते हो उसको हम ज़रुर जानते हैं

98

فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَكُنْ مِنَ السَّاجِدِينَ

तो तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना से उसकी तस्बीह करो

और (उसकी बारगाह में) सजदा करने वालों में हो जाओ

99

وَاعْبُدْ رَبَّكَ حَتَّى يَأْتِيَكَ الْيَقِينُ

और जब तक तुम्हारे पास मौत आए अपने परवरदिगार की इबादत में लगे रहो

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